કલ્પવૃક્ષ

ૐ ભૂર્ભુવ:સ્વ: તત્સવિતુર્વરેણ્યં ભર્ગોદેવસ્ય ધીમહિ ધિયો યો ન: પ્રચોદયાત્ ||

श्रद्धा अत्यंत समाजोपयोगी तत्व

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

श्रद्धा अत्यंत समाजोपयोगी तत्व

संपूर्ण जीवन प्रवाह एवं उसकी उपलब्धियाँ वस्तुतः श्रद्धा" की ही परिणति है ।  माँ अपना अभिन्न अंग मानकर नौ माह तक अपने गर्भ में बच्चे का सेचन करती है । अपने रक्त मांस को काटकर शिशु को पोषण प्रदान करती है । श्रद्धाका यह उत्कृष्ट स्वरूप है जिसका बीजारोपण माँ बच्चे में संस्कार के रूप में करती है । नि:स्वार्थ भाव से उसको संरक्षण देती है । अनावश्यक भार, कष्टों का जंजाल समझने का कुतर्क उठे तो नवशिशु  का प्रादु्र्भाव ही संभव न हो सकेगा ।
 यह श्रद्धाही है जिसके कारण बच्चा माँ के सीने से चिपकने, स्नेह-दुलार पाने के लिए लालायित रहता, रोता-कलपता है । मूक भाषा वाणी से रहित नव शिशु की श्रद्धाएकमात्र माँ के ऊपर ही होती है । माता-पिता भी निश्चल हृदय से बच्चे के विकास के लिए हर संभव प्रयास करते हैं । खाने-पीने, स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर शिक्षा-दीक्षा के झंझट भरे सरंजाम जुटाते हैं । समग्र विकास ही उनका एकमात्र लक्ष्य होता है । तर्कतो हर बात को उपयोगिता की कसौटी पर कसता है ।इस आधार पर कसने पर माता-पिता को हर दृष्टि से घाटा ही घाटा दिखायी  पड़ेगा । बात "तर्क" की मान ली जाए तो बच्चे का अस्तित्व ही शंका में पड़ जाएगा । दृष्टि मात्र उपयोगितावादी हो जाए तथा यह परंपरा प्रत्येक क्षेत्र में चल पड़े, तो परिवार एवं समाज विश्रृंखलित हो जाएगा । सभ्यता को अधिक दिनों तक जीवित नहीं रखा जा सकेगा ।
 श्रद्धा ही पारिवारिक जीवन को स्नेह सूत्र में बांधे रहती है ।  सहयोग करने, अन्य सदस्यों के लिए अपने स्वार्थ का उत्सर्ग करने की प्रेरणा देती है । पारिवारिक विघटन में इसका अभाव ही कारण बनता है । पति-पत्नी के बीच मनमुटाव, सदस्यों के बीच टकरा हट का कारण अश्रद्धा है । तर्कएवं "उपयोगिता" की कसौटी पर कसने पर तो वृद्ध माता-पिता का महत्व भी समझ में नहीं आता ।वे भार के रूप में ही दिखाई पड़ते हैं । किंतु श्रद्धा दृष्टि जानती  है कि  उनका कितना ऋण चढ़ा है  उनके स्नेहाशीर्वाद को पाने की कामना आजीवन बनी रहती है । यह भाव दृष्टि तो श्रद्धा की ही उपलब्धि है, जो सदा एक युवक को माता पिता के समक्ष नतमस्तक किये रहती है ।
साधना से सिद्धि- पृष्ठ-६२
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

साधना की सफलता के दस लक्षण

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

साधना की सफलता के दस लक्षण

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता पर भीतर ही भीतर भारी हेर−फेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोश और मनोमय कोषों में जो परिवर्तन होता है उसकी छाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टि गोचर न हो ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढांचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर फेर के चिन्ह शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।
 यह दस_लक्षण नीचे दिए जाते है।
1. शरीर में हलकापन और मन में उत्साह होता है।
2. शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगंध आने लगती है।
3. त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।
4. तामसिक आहार विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विक दिशा में मन लगता है ।
5. स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।
6. नेत्रों में तेज झलकने लगता है।
7. किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है तो उसके संबंध में बहुत सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिमथित होती है। जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती है।
8. दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती।
9. भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्णाभ्यास मिलने लगता है।
10.शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ भला या बुरा कर सकता है।
यह दस लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि साधक का मार्ग पक गया और सिद्धि का प्रसव हो चुका। इस शक्ति सन्तति को जो साधक सावधानी के साथ पालते पोसते हैं उसे पुष्ट करते है। वे भविष्य में आज्ञाकारी सन्तान वाले बुजुर्ग की तरह आनन्द परिणामों का उपभोग करते हैं किन्तु जो फूहड़ जन्मते ही सिद्धि का दुरुपयोग करते हैं उनकी स्वल्प शक्ति का विचार न करते हुए उस पर अधिक भार डालते हैं उनकी गोदी खाली हो जाती है और मृतवत्सा माता की तरह उन्हें पश्चाताप करना पड़ता है।

 पन्डित श्री राम शर्मा आचार्य

"श्रद्धा" और "विश्वास" उत्कृष्ट जीवन का आधार

"श्रद्धा" और "विश्वास" उत्कृष्ट जीवन का आधार

"श्रद्धा" और "विश्वास" के बिना भौतिक जीवन में भी गति नहीं, फिर आध्यात्मिक क्षेत्र का तो उसे प्राण ही कहा गया है । आदर्शवादिता में प्रत्यक्षत: हानि ही रहती है, पर "उच्चस्तरीय मान्यताओं" में "श्रद्धा" रखने के कारण ही मनुष्य त्याग-बलिदान का कष्ट सहन करने के लिए खुशी-खुशी तैयार होता है . ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व तक प्रयोगशालाओं की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता । वह निश्चित रूप से "श्रद्धा" पर ही अवलंबित है । मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का, आदतों का गहरा पुट रहता है, वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार की आदतें और मान्यताएँ अत्यंत गहराई तक घुसी रहती हैं और वे उन्हें छोड़ने को सहज ही तैयार नहीं होते । यह संस्कार और कुछ नहीं चिरकाल तक सोचे गये, माने गये और व्यवहार में लाए गये अभ्यासों का ही परिपाक है  । तथ्यों की कसौटी पर इन संस्कारों में से अधिकांश "बेतुके" और "अंधविश्वास" स्तर के होते हैं, पर मनुष्य इन्हें इतनी मजबूती से पकड़े होता है कि उसके लिए वे ही "सत्य" बन जाते हैं और सत्य और तथ्य कह कर वह उन पूर्वाग्रहों के प्रति अपनी कट्टरता का परिचय देता है । उसके लिए लड़ने-मरने तक को तैयार हो जाता है । यह मान्यता परक कट्टरता और कुछ नहीं मात्र "श्रद्धा" द्वारा रची गयी खिलवाड़ मात्र है ।

"तर्क" की शक्ति का जन्म भी  "श्रद्धा" के गर्भ से ही होता है । यों तो तर्क विचारणा को जन्म देता है और श्रद्धा विश्वास को, पर विचारणा भी विचार के लिए आधार ढूँढती है । आधार तभी बन सकता है जब "विश्वास" हो । अन्यथा तर्क बुद्धि तो किसी भी केंद्र पर चिंतन को केंद्रीभूत नहीं कर सकती । यह तो तभी बन पाता है जब विश्वास के सहारे विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि *"श्रद्धा" के अभाव में "विचारणा", "तर्क" का प्रादुर्भाव संभव नहीं । किसी विषय पर आस्था ही तर्कों का सृजन करती, उस पर सोचने, सत्य को खोज निकालने को प्रेरित करती है । "श्रद्धा" मानवीय व्यक्तित्व के मूल में घुली-मिली है, जिसके बिना एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता । आगे बढ़ने, प्रगति करने की बात तो दूर रही । यह बात अलग है कि हम उसका अनुभव न कर सकें ।

साधना से सिद्धि- पृष्ठ-६०
 पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

बेटा , हमारे विचारों को फैलाना ही हमारी सेवा है ।

अमृतवाणी - युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य


 

मनुष्य का यौवन वसन्त केवल एक बार ही आता है।

वृक्ष वसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आभा के साथ विकसित होता है।        

वृक्षों को कई वसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन वसन्त केवल एक बार ही आता है। इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था और उसके पश्चात मृत्यु।       

जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उनको हाथ मल-मलकर पछताना ही शेष रह जाता है। युवावस्था जीवन का वह अंश है, जिसमें उत्साह, स्फूर्ति, उमङ्ग, उन्माद और क्रियाशीलता या तरङ्गे प्रचण्ड वेग के साथ बहती रहती है।       

आज तक जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उनकी नींव यौवन की सुदृढ़ भूमि पर ही रखी गई है। बालकों और वृद्धों की शक्ति सीमित होने के कारण उनसे किसी महान कार्य की आशा बहुत ही स्वल्प मात्रा में की जा सकती है। यौवन सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।        

ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उत्तम से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उनके नवयुवकों के साथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरूक, कर्तव्य परायण और देशभक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्नति हो सकती है।        जहाँ के युवकों में आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थपरता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश-जाति कदापि उन्नति के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकती।        

भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों  को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हों, इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है। (संकलित व सम्पादित)  

अखण्ड ज्योति जून 1943 पृष्ठ 16

૧૦૮ મહાદેવ શિવ ભગવાન નામાવલી



https://youtu.be/Rhl6kHd_OHI

०१. अमृतवाणी - युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने के लिए इतनी बहादुरी की जरुरत है जितनी सिपाहियों को भी नहीं पड़ती |

सिपाहियों को कम ताकत की जरुरत है , लेकिन अपने मानसिक चोरों के विरुद्ध लड़ने के लिए बहुत बड़ी ताकत चाहिए । 

हम जिस चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं , उसमें से निकलने के लिए बड़ी बहादुरी की जरुरत है - हिम्मत की जरुरत है ।

मेरे गुरुदेव ने मुझे यही हिम्मत दी और मेरा शक्तिपात हो गया | शक्तिपात होने के पश्चात् में बढ़ता हुआ चला आया | 

देखिये..... रहस्य क्या ढाई अक्षर में..!!

मैंने कभी पढा था"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय,ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।। "बहुत अथक प्रयास के बाद अब पता लगा ये ढाई अक्षर क्या है
-   देखिये ढाई अक्षर✍️✍️
√  ब्रह्मा और ढाई अक्षर की सृष्टि
√  विष्णु  और ढाई अक्षर की लक्ष्मी । 
√  कृष्ण और ढाई अक्षर की दुर्गा और शक्ति
√  श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति
√  त्याग  और ढाई अक्षर का  ध्यान
√  तुष्टि  और ढाई अक्षर की  इच्छा
√  धर्म  और ढाई अक्षर का  कर्म
√  भाग्य और ढाई अक्षर की  व्यथा
√  ग्रन्थ  और ढाई अक्षर का  सन्त
√  शब्द  और ढाई अक्षर का अर्थ
√  सत्य  और ढाई अक्षर की  मिथ्या
√  श्रुति  और ढाई अक्षर की  ध्वनि
√  अग्नि  और ढाई अक्षर का  कुण्ड
√  मन्त्र और ढाई अक्षर का  यन्त्र
√  श्वांस  और ढाई अक्षर के  प्राण
√  जन्म  ढाई अक्षर की  मृत्यु
√  अस्थि  और ढाई अक्षर की अर्थी
√  प्यार  और ढाई अक्षर का  युद्ध
√  मित्र  और ढाई अक्षर का  शत्रु
√  प्रेम  और ढाई अक्षर की  घृणा
जन्म से लेकर मृत्यु तक हम बंधे हैं ढाई अक्षर में।
हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में और ढाई अक्षर ही अन्त में।
समझ न पाया कोई भी है रहस्य क्या ढाई अक्षर में..!!

02. प्रज्ञा अवतार की कलम से✍🏻


वृद्धों की समस्याएं और समाधान
पहला काम तो यह कीजिए कि बुढ़ापे की इस अवस्था में जवानी के गुलछर्रे याद कर करके कूढना,छोड़िए क्योंकि ऐसा करने से आपको उन दिनों की अनुभूति होती रहेगी और वर्तमान की स्थिति उनके अनुकूल नहीं है इसलिए आपको और भी अधिक मानसिक कष्ट होगा। शरीर को जवानी में थका डाला गया है,मन विकारों के पास गिरवी रख दिया है।अधूरे काम आपको सांप के कांटे की तरह छिद रहे हैं। आप पछताते और मन ही मन कहते हैं "हाय मैं कुछ भी तो नहीं कर सका"! इस हाय तोबा,ताप और पश्चाताप को त्यागिए। जो कुछ थोड़ा बहुत कर सके हैं,उसी पर संतोष कीजिए और आगे के लिए अथवा पुनर्जन्म के लिए संस्कारों का मानसिक निर्माण कीजिए। इससे भी अच्छा यह है कि इसी स्थिति के अनुरूप जो कुछ भी कर सकें करने का प्रयत्न कीजिए, पर जो कुछ नहीं कर सके हैं अथवा जो कर नहीं सकते उसकी चिंता छोड़िए। चिंता बुढ़ापे के हाथ में पैनी छुरी ही समझिए।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

01. प्रज्ञा अवतार की कलम से✍🏻

वृद्धों की समस्याएं और समाधान अब आप बूढ़े हो गए हैं और जवानी में बुढ़ापे की तैयारी भी नहीं की है। इसलिए स्वाभाविक है कि आप पछताएं और अपने को कोसे। वही आप कर भी रहे हैं। मगर इस पछताने, कोसने और रोने झीकनें से होता क्या है।न तो इससे बुढ़ापा चला जाएगा और न उससे बुढ़ापा काटने में मदद मिलेगी। अब तो आपको लाभ साहस पूर्वक बुढ़ापे से टक्कर लेने से ही मिलेगा।
 पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य✍🏻

વેદના ઋષિનું મહાન દર્શન-સંશોધન એટલે ગાયત્રી મહામંત્ર.

ગાયત્રી છંદનો એક પ્રકાર છે. વેદમાં ગાયત્રી, અનુષ્ટુપ, જગતી, બૃહતી વગેરે અનેક છંદો છે. તેમાં મુખ્ય ગાયત્રી અને અનુષ્ટુપ છંદ છે. ગાયત્રી છંદમાં ૮ અક્ષરના ત્રણ ચરણો કુલ મળીને ૨૪ અક્ષરો થાય છે. સૌથી લોકપ્રિય સવિતા (સૂર્યનારાયણ) ગાયત્રી મંત્ર છે.

ૐ ભૂર્ભુવર્સ્વ: તત્સવિતુર્વરેણ્યમ્ ભર્ગોદેવસ્ય ધીમહિ ધિયો યોન: પ્રચોદયાત્ (ઋગ્વેદ, ૩/૬૨/૧૦, યજુર્વેદ ૩/૩૫)
ભાવાર્થ: પૃથ્વી, આકાશ અને સ્વર્ગલોક એમ ત્રણેય જગતને પ્રકાશિત કરનારા હે પરમ તેજસ્વી સવિતાદેવ, અમે આપનું ધ્યાન કરીએ છીએ. આપ અમારી બુદ્ધિને પ્રકાશિત કરી અમારો ઉત્કર્ષ કરો!

અહીં ભૂ:, ભુવ: અને સ્વ: એમ ત્રણ વ્યાહૃતિઓ છે. (વ્યાહૃતિઓને બાદ કરતાં ચોવીસ અક્ષર થાય છે.) જે ત્રણ લોક અથવા આપણા અસ્તિત્વનાં ત્રણ સ્તરો- સ્થૂળ, સૂક્ષ્મ અને કારણ શરીરનું પ્રતિનિધિત્વ કરે છે. સવિતા પ્રકાશ અને જ્ઞાનના દેવતા છે. આ બુદ્ધિને સન્માર્ગે રહે તેવી પ્રાર્થના છે. 

માનસકાર કહે છે, ‘જહાં સુમતિ તહાં સંપતિ નાના જહાં કુમતિ તહાં વિપતિ નિદાના!’ સન્મતિથી મળે સર્વસંપદા અને કુમતિથી વિપત્તિ. કેવો પ્રેક્ટિકલ મંત્ર છે! બીજા દેવતાનાં ગાયત્રી મંત્રો પણ છે. જેમ કે, 

ગણેશ ગાયત્રી - એકદંતાય વિદ્મહે વક્રતુંડાય ધીમહિ તન્નો દંતી પ્રચોદયાત્; 

શિવગાયત્રી - તત્પુરુષાય વિદ્મહે મહાદેવાય ધીમહિ તન્નો રુદ્ર: પ્રચોદયાત્; 

વિષ્ણુગાયત્રી - નારાયણાય વિદ્મહે વાસુદેવાય ધીમહિ તન્નો કૃષ્ણ: પ્રચોદયાત્; 

હનુમાન ગાયત્રી - આંજનેયાય વિદ્મહે વાયુપુત્રાય ધીમહિ તન્નો હનુમાન્ પ્રચોદયાત્ વગેરે. 

ઇષ્ટદેવતાની ઉપાસના જે તે ગાયત્રી મંત્રથી થઇ શકે. જો કે સવિતા ગાયત્રી મંત્રનું વિશેષ મહત્ત્વ છે.
સવિતા: પ્રસવિતા! જે પ્રસવ કરે તે સવિતા. આપણે જાણીએ છીએ કે પૃથ્વી સહિતના સૌરમંડળના નવ ગ્રહોની ઉત્પત્તિ સૂર્યમાંથી થઇ છે. સવાર પડે અને આખું જગત જાગી ઊઠે. માણસ તો ઠીક, પશુ-પંખી અને વનસ્પતિ પણ! સૂર્યની ઊર્જા વિના કશું સંભવે ખરું? આપણી જોવાની શક્તિ અને સાત રંગો પણ સૂર્યના કિરણોની જ દેણ છે. એ સાત રંગો એ જ સૂર્યનારાયણના સાત ઘોડા! સૂરજદાદાની નિયમિતતા તો જુઓ! એ ક્યારેય મોડા પડે ખરા? વળી એમનો પ્રેમ પણ પૂર્વગ્રહ કે પક્ષપાત વગરનો છે. સુંદર મજાના ફૂલ હોય કે ઉકરડો - બધે જ સરખો પ્રકાશ આપે. સૂરજના તાપથી વરસાદ પડે, અનાજ પાકે, ઋતુઓ સર્જાય, ફળફુલ મળે અને વાતાવરણ ચોખ્ખું થાય! સૂર્યની ઊર્જા વિના આપણું જીવન સંભવ ખરું? કહે છે કે જેની ઉપાસના કરો, તેવા જ બનો. સૂર્ય જેવા તેજસ્વી બનવું કોને ન ગમે?
આધુનિક સમયમાં ગાયત્રીમંત્ર પર ખૂબ સંશોધન થયું છે. તેની હકારાત્મક અસરો અંગે અઢળક વૈજ્ઞાનિક પુરાવા પણ મળી આવે છે. ગાયત્રીની સાધનાથી મન શાંત રહે છે. યાદશક્તિ સતેજ થાય છે. આરોગ્ય સારું રહે છે. તર્ક અને સમજશક્તિ કેળવાય છે. ધ્યાનશક્તિ વધે એટલે કામકાજમાં આપોઆપ સફળતા મળે. બુદ્ધિનો ઉદય અથવા રચનાત્મક ઉપયોગની પ્રાર્થના પોતે જ કેટલી પ્રોગ્રેસિવ છે! હજારો વર્ષથી ગાયત્રી ઉપાસના થતી રહી છે, થતી રહેશે.
ગાયત્રી ઉપાસના કઇ રીતે કરવી? 
સવારમાં વહેલા ઊઠી સ્નાન કરીને સૂર્યનમસ્કાર સાથે પ્રાણાયામ કરીએ. કૂમળો તડકો વિટામિન ''ડી'' આપે અને સૂર્યને તાંબાના કળશથી ધરેલ અર્ધ્યનું જળ પીવું આરોગ્યપ્રદ છે. આ બધાં સાથે ગાયત્રી મંત્રની નિયમિત એક માળા એકાગ્રતા અને આત્મવિશ્વાસ વધારે છે. આવો, વેદના ઋષિનો કૃપાપ્રસાદ પ્રાપ્ત કરી સો વર્ષનું સુખી, રચનાત્મક અને કાર્યક્ષમ આયુષ્ય ભોગવીએ.

जीवन के सारे अधिकार ईश्वर के हाथ

 

             जीवन के सारे अधिकार जब ईश्वर के हाथ सौंप देते हैं तो पूर्ण निश्चिंतता आ जाती है। कोई भय नहीं, कोई आकांक्षा नहीं। न कुछ दुःख न किसी प्रकार का सुख शेष रहता है। 

             पूर्ण तृप्ति और अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। जब जीवन की बागडोर परमात्मा को सौंप देते हैं, तब उसे बुलाना भी नहीं पडता। वह स्वयं ही आकर भक्त के प्रत्येक अवयव में स्थित होकर अपना कार्य करने लगते हैं। इस स्थिति को ही पूर्ण समर्पण कहते हैं।

પ્રજ્ઞા પુરાણ કથા પરિવાર વ્યવસ્થા પ્રકરણ ૨૪

વિશ્વાસ કરો કે તમે મહાન છો

યુગક્રાંતિના ઘડવૈયા પં. શ્રીરામ શર્મા આચાર્ય

યુગક્રાંતિના ઘડવૈયા પં. શ્રીરામ શર્મા આચાર્યની કલમે લખાયેલ ક્રાંતિકારી સાહિત્યમાં જીવનના દરેક વિષયને સ્પર્શ કરાયો છે અને ભાવ સંવેદનાને અનુપ્રાણિત કરવાવાળા મહામૂલા સાહિત્યનું સર્જન કરવામાં આવ્યું છે. તેઓ કહેતા “ન અમે અખબારનવીસ છીએ, ન બુક સેલર; ન સિઘ્ધપુરૂષ. અમે તો યુગદ્રષ્ટા છીએ. અમારાં વિચારક્રાંતિબીજ અમારી અંતરની આગ છે. એને વધુમાં વધુ લોકો સુધી ૫હોંચાડો તો તે પૂરા વિશ્વને હલાવી દેશે.”

દરેક આર્ટીકલ વાંચીને તેને યથાશક્તિ–મતિ જીવનમાં ઉતારવા પ્રયત્ન કરશો તથા તો ખરેખર જીવન ધન્ય બની જશે આ૫ના અમૂલ્ય પ્રતિભાવો આપતા રહેશો .

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