કલ્પવૃક્ષ

ૐ ભૂર્ભુવ:સ્વ: તત્સવિતુર્વરેણ્યં ભર્ગોદેવસ્ય ધીમહિ ધિયો યો ન: પ્રચોદયાત્ ||

बात-बात पर उद्विग्न न हों


बात-बात पर उद्विग्न न हों

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए तत्संबंधी योग्यता, अनुभव के साथ-साथ मानसिक संतुलन, शांत मस्तिष्क की भी अधिक आवश्यकता होती है । कोई व्यक्ति कितना ही योग्य, अनुभवी, गुणी क्यों न हो, यदि बात-बात पर उसका मन आँधी-तूफान की तरह खुद उद्वेलित, अशांत हो जाता हो तो वह जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएगा । उसकी शक्तियाँ व्यर्थ में ही नष्ट हो जाएँगी और भली प्रकार से वह अपने काम पूरे नहीं कर सकेगा ।

प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम "शांत" और "संतुलित" मस्तिष्क के द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं । संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, उसके मूल में धीर-गंभीर, शांत मस्तिष्क ही रहे हैं । कोई भी साहित्यकार, वैज्ञानिक, कलाकार व शिल्पी यहाँ तक कि बढ़ई, लुहार, सफाई करने वाला श्रमिक तक अपने कार्य तब तक भली-भाँति नहीं कर सकते, जब तक उनकी मन:स्थिति शांत न हो ।  कोई भी साधना  स्वस्थ, संतुलित मनोभूमि में ही फलित हो सकती है । जो क्षण-क्षण में उत्तेजित हो जाता हो, सामान्य सी घटनाएँ जिसे उद्वेलित कर देती हों, जिसका मन अशांत और विक्षुब्ध बना रहता हो, ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य भली प्रकार से नहीं कर सकेगा  और न वह अपने काम के बारे में ठीक-ठीक  सोच-समझ ही सकेगा ।

शांत और संतुलित अवस्था में ही मन कार्य करने तथा भली प्रकार सोचने-समझने की सहज स्थिति में होता है । ऐसी ही दशा में वह कोई रचनात्मक उपयोगी बात सोच सकता है और उसे पूरी कर सकता है । संतुलित स्थिति में मनुष्य की शक्तियाँ एकाग्र,  केंद्रित और परस्पर सहयोगी होकर काम करती हैं । अशांत स्थिति में आवेग,उद्वेगों में शक्तियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं । वे अपनी मनचाही दिशाओं में दौड़ने लगती हैं ।

मन में उठने वाले उद्वेगों का मुख्य कारण शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता ही है । पाचन-क्रिया की गड़बड़ी, जीर्ण रोग,  अनिद्रा दुर्बलता आदि से मन  भी  अस्त-व्यस्त और उद्विग्न बन जाता है । शरीर. में कोई गड़बड़ी हो, कोई कष्ट हो, तो. प्रायः चिड़चिड़ाहट, अधीरता, मानसिक अशांति, और अतृप्ति पैदा हो जाती है, जो मन को "असंतुलित" बना देती है । संतुलित और शांत मनोदशा के लिए हमें अपने स्वास्थ्य को सुधारना होगा । ऐसा वातावरण और संगत जिसमें हमें बार-बार उद्विग्न होना पडे़,  मनोभूमि असंतुलित हो  जावे उससे बचते-बचते रहना चाहिए ।

आवेशग्रस्त होने से अपार हानि- पृष्ठ-३
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

इस पर गंभीरतापूर्वक सोचें

इस पर गंभीरतापूर्वक सोचें

मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है । इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है ।अनेक "विशेषताओं' के साथ ही एक "भौतिक दुर्गुण" भी है कि समीपवर्ती वातावरण में जो कुछ होता देखता है, उसी के अनुसरण का अभ्यासी बन जाता है ।

जीवन के साथ घनिष्ठता पूर्वक जुड़ी हुई एक कुटेव "चटोरेपन" की है । सृष्टि के सभी प्राणी अपना स्वाभाविक आहार कच्चे रूप में प्राप्त करते हैं, कोई प्राणी अपने भोजन को पकाता, भूनता, तलता, मिर्च-मसाले, शक्कर आदि के आधार पर चटपटा नहीं बनाता । मनुष्य ने पाक कला सीखी, जायकेदार व्यंजन बनाना और स्वाद के.नाम पर अभक्ष्य खाना आरंभ कर दिया । फलतः पाचनतंत्र खराब हुआ, अनेकानेक रोग पीछे पड़े और जीवन अवधि में भारी कटौती हो गई । यदि यह कुटेव न अपनाई गई होती, उपयुक्त शाकाहार पर निर्भर रहा गया होता तो प्रायः आधे आहार से काम चल जाता । पकने में लगने वाला श्रम और धन बर्बाद न होता । पेट ठीक बना रहता, शरीर में शक्ति रहती और लंबा जीवन जीने का अवसर मिलता, पर मनुष्य है जो चटोरा बनकर गुलाम रहने में ही प्रसन्नता अनुभव करता है। व्यंजनों में अपनी रुचि बढ़ाता ही जाता है । फलतः दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु को न्यौत बुलाता है, इसे "समझदारी" को "नासमझी" न कहा जाए तो और क्या कहें ?

लोग घरों में रहते हैं, पर यह आवश्यक नहीं समझते कि घर की बनावट ऐसी हो जिसमें धूप और हवा का आवागमन पूरी तरह होता रहे । किंतु देखा जाता है कि झोपड़ी में रहने की अपेक्षा ऐसे घरों में लोग रहते हैं, जिनमें न धूप पहुँचती है और न हवा ।

यदि मनुष्य ने प्राकृतिक जीवन जिया होता, प्रकृति के सान्निध्य में रहा होता, आहार-विहार में व्यतिक्रम न किया होता, धूप, हवा के संपर्क से अपने को बचाकर न रखा होता तो "आरोग्य" जैसी बहुमूल्य संपदा को गँवा बैठने का त्रास न सहना पड़ता । जैसे-जैसे मनुष्य ने अपनी जीवनशैली में कृत्रिमता को बढ़ावा दिया वैसे-वैसे उसने अपने लिए संकटों को आमंत्रण दिया । मनुष्य की विचारणा शक्ति से नित नूतन अन्वेषण तो होंगें, लेकिन जीवन तो हमें जीना है, आत्म-संयम को अपना कर सुखमय जीवन जिया जा सकता है।

समझदारों की "नासमझी"  पृष्ठ-६
पपन्डित बश्रीराम शर्मा आचार्य

दारिद्र्य अर्थात आलस्य का दुष्परिणाम

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

दारिद्र्य अर्थात आलस्य का दुष्परिणाम

"दारिद्र्य"और कुछ नहीं मनुष्य के शारीरिक और मानसिक आलस्य का ही प्रतिफल है । जिस वस्तु का समुचित उपयोग नहीं होता वह अपनी विशेषता खो बैठती है । सीलन में पड़े हुए लोहे को जंग लग जाती है और उसी से वह गलता चला जाता है ।  खूँटे से बँधा हुआ घोड़ा अड़ियल हो जाता है, जिन पक्षियों को उड़ने का अवसर नहीं मिलता वे अन्तत: उड़ने की शक्ति ही खो बैठते हैं । पान के पत्तों की हेराफेरी न की जाय तो जल्दी ही सड़ जाते हैं । यही स्थिति मनुष्य के शरीर की भी है, यदि उसे परिश्रम से वंचित रहना पड़े तो अपनी प्रतिभा, स्फूर्ति एवं प्रगतिशील तेजस्विता ही नहीं खो बैठता प्रत्युत अवसाद ग्रस्त होकर रोगी भी रहने लगता है । जो बैठे रहते हैं, उनकी तोंद निकल आती है, शरीर भारी हो जाता है, चलने-फिरने में कठिनाई होती है, साँस फूलती है, दिल धड़कता है, पेशाब में शक्कर जाने लगती है, पैर भड़कते हैं और सिरदर्द बना रहता है । इतनी व्यथाएँ उन लोगों के पल्ले बँधती है, जिन्हें परिश्रम नहीं करना पड़ता और बैठे-बैठे आलस्य में दिन बिताते हैं ।

आराम तलब,  मेहनत से बचने वाले लोगों की जीवनी शक्ति क्षीण हो जाती है, सर्दी-गर्मी और बीमारियों से लड़ने की सामर्थ्य चली जाती है । जल्दी-जल्दी जुकाम होता है, सर्दी, खाँसी सताती है, जल्दी लू लगती है, गर्मी का प्रकोप रहता है । कोई छोटी सी भी बीमारी हो जाय तो मुद्दतों जड़ जमाये बैठी रहती है, कीमती दवा-दारू कराने पर भी टलने का नाम नहीं लेती । ऐसा होता इसलिए है कि वह जीवनी शक्ति जो परिश्रम करने वाले में प्रदीप्त रहती है, ऐसे लोगों में मर जाती है और वे किसी छोटे-मोटे आक्रमण तक का सामना कर सकने में असमर्थ हो जाते हैं ।

जिन्होंने कठोर श्रम के द्वारा अपनी जीवनी शक्ति को प्रखर और प्रचुर बनाया है वे शरीर पर होने वाले किसी भी बाह्य आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए जल्दी ही रोग मुक्त हो जाते हैं । उन्हें अच्छे होते देर नहीं लगती । कोई चोट लग जाय तो जल्दी ही जख्म भर जाता है, सर्दी-गर्मी का प्रकोप एक दो दिन से अधिक नहीं रहता *पर जिनमें उस तरह की क्षमता संचित नहीं है, उन्हें थोड़ी-थोड़ी विकृतियाँ मुद्दतों घेरे बैठी रहती हैं ।

"आलस्य" छोड़िए-"परिश्रमी" बनिए  पृष्ठ-५
    पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

"परिश्रम" - विलक्षण सद्गुण

"परिश्रम" - विलक्षण सद्गुण

कई बार कुछ लोगों में जन्मजात प्रतिभाएँ भी पाई जाती हैं । उनमें शारीरिक एवं मानसिक प्रतिभा दूसरों की तुलना में अधिक होती है । इसके आधार पर वे जल्दी और अधिक सरलता से सफलता प्राप्त कर लेते हैं । यह ईश्वर का पक्षपात या भाग्य का खेल नहीं, उनके पूर्व जन्मों के "परिश्रम" का फल है, जो जन्मजात संस्कार के रूप में इस जन्म में अनायास ही उपलब्धि जैसा दीख रहा है । 

"परिश्रम" वह साधना है जो कभी निष्फल नहीं जाती । आज उसका अभीष्ट परिणाम न मिले तो भी यह नहीं सोचना चाहिए कि श्रम साधना बेकार चली गई, जी तोड़ मेहनत करने का सद्गुण जिसमें विकसित हो जाता है, उसकी अन्य अनेकों प्रतिभाएँ जागृत हो जाती हैं । परिस्थिति वश चाही हुइ दिशा में, चाहे हुए समय में कोई सफलता न भी मिले तो भी यह निश्चित है कि वह व्यक्ति प्रतिभाशाली एवं मनीषी अवश्य बन जाता है और अपनी इन विशेषताओं के कारण समय-समय पर अन्य अनेक प्रयोजनों में दूसरों की अपेक्षा अधिक सफल सिद्ध होता है ।

देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन करके १४ रत्न निकाले थे । दोनों की दरिद्रता एवं विपन्नता से द्रवित होकर उन्हें प्रजापति ने यही परामर्श दिया था कि आप लोग अनवरत "परिश्रम" करें । इसके फलस्वरूप आपके सभी अभाव एवं कष्ट दूर होंगें । उन्होंने किया भी वैसा ही । फलस्वरूप जो कुछ मिला, उसे पाकर उन्हें ही नहीं समस्त संसार को अधिक सुखी, अधिक सम्पन्न होने का अवसर मिला, हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते तो उनका दैन्य-दारिद्र्य दिन-दिन बढ़ता ही रहता और अंत में वे अपने अस्तित्व से ही हाथ धो बैठते ।

"आलस्य" छोड़िए-"परिश्रमी" बनिए  पृष्ठ-४
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य शरीर एक वरदान

मनुष्य शरीर एक वरदान

मनुष्य का शरीर एक "कल्पवृक्ष" है,  इसकी छाया में बैठा हुआ मन उत्तम वरदान पा सकता है, मनोकामनाएँ पूरी कर सकता है पर स्वर्ग के और पृथ्वी के कल्पवृक्षों में थोड़ा सा अंतर यह है कि स्वर्ग के कल्पवृक्ष इच्छा करते ही, बिना श्रम के ही मनोकामनाएँ पूरी कर देते हैं, पर पृथ्वी का यह "कल्पवृक्ष" मानव शरीर "परिश्रम" की कसौटी पर कसे जाने के उपरांत ही अभीष्ट फल प्रदान करता है ।

वैसे उनमें शक्ति, सामर्थ्य एवं संभावना इतनी अधिक सन्निहित है कि मनुष्य चाहे जिस स्थिति तक पहुँच सकता है, चाहे जो बन सकता है, चाहे जिस वस्तु को प्राप्त कर सकता है । उसकी शक्ति का कोई अंत नहीं ।मानव शरीर का निर्माण बड़े विलक्षण मसाले से हुआ है । यदि निकम्मा पड़ा रहे तो बात दूसरी है, अन्य किसी भी दिशा में उसे सुनियोजित ढंग से लगा दिया जाय तो मंजिल पर मंजिल पार करते हुए सफलता की अंतिम सीढ़ी तक जा पहुँचता है ।

"परिश्रम" एक प्रकार की शरीर साधना है । इस साधना के द्वारा शरीर देवता को प्रसन्न कर उससे अभीष्ट वरदान प्राप्त किये जा सकते हैं । जिस प्रकार देवताओं या भूत-पलीतों की साधना की जाती है, उसी प्रकार यह "शरीर" भी एक प्रत्यक्ष देवता है, इसमें एक से एक अद्भुत वरदान दे सकने की  क्षमता विद्यमान है, पर वह देता उसी को है, जो "श्रम"-"साधना" द्वारा अपनी "श्रद्धा", "भक्ति" एवं "पात्रता" की परीक्षा देने में पीछे नहीं हटता ।

"आलस्य" छोड़िए-परिश्रमी बनिए  पृष्ठ-३
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

आत्मविश्वास जगाइये

आत्मविश्वास जगाइये

जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल होने के लिए "आत्मविश्वास" की आवश्यकता होती है ।अच्छे से अच्छा तैराक भी आत्मविश्वास के अभाव में किसी नदी को पार नहीं कर सकता । वह बीच में फँस जायेगा, नदी के प्रवाह में बह जाएगा, अथवा हाथ पैर पटक कर वापिस लौट आएगा । यही बात भवसागर पार करने में लागू होती है । जीवन में अनेकों कठिनाइयाँ,  उलझनें, अप्रिय परिस्थितियाँ आती रहती हैं । 

इन झंझावातों में कठोर चट्टान की तरह अपनी राह पर अडिग रहने के लिए "आत्मविश्वास" की आवश्यकता होती है ।

लक्ष्य जितना बड़ा होगा, मार्ग भी उतना ही लंबा होगा और अवरोध भी उतने ही अधिक आएँगे । इसलिए उतने ही प्रबल "आत्मविश्वास" की आवश्यकता होगी । संसार भी "आत्मविश्वासी" का समर्थन करता है । 

"आत्मविश्वासी" के  चेहरे पर आकर्षण बनकर फूट पड़ता है, जिससे पराए भी अपने बन जाते हैं । अनजान भी हमराही की तरह साथ देते हैं । विपरीत परिस्थितियाँ भी "आत्मविश्वासी" के लिए अनुकूल परिणाम पैदा करती है ।

 "आत्मविश्वास" का मूल स्वरुप है "आत्मसत्ता" पर  विश्वास करना । जिसे अपनी आत्मा की अजेय शक्ति महानता पर विश्वास है, जो अपने जीवन की सार्थकता, महत्ता, महानता स्वीकार करता है, उसी में "आत्मविश्वास" का स्रोत उमड़ पड़ता है, वही जीवन पथ के अवरोधों, कठिनाइयों को चीरता हुआ, राह के रोड़ो को  धकेलता हुआ, अपना मार्ग स्वयं निकाल लेता है । प्रकृति भी "आत्मविश्वासी"  पुरुष का साथ देती है,  अपने नियमों का व्यतिरेक करके भी । अपने आप को तुच्छ,  अनावश्यक समझने वाले संसार सागर में तिनके की तरह कभी इधर कभी उधर थपेड़े खाते हैं । जिन्हें अपनी आत्मसत्ता, अपने महान अस्तित्व का बोध नहीं, उन्हें जीवन के समरांगण में हारना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । जो अपने आप को तुच्छ और अनावश्यक समझते हैं उन्हें दूसरे कैसे आवश्यक और महत्वपूर्ण समझ सकते हैं ? आत्मविश्वास के अभाव में संदेह, भय, चिंता आदि मनोविकार पनप उठते हैं और तब दूसरों का विश्वास, आत्मीयता, सहानुभूति भी प्राप्त नहीं होती ।

"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-२८
 पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रतिकूलताओं में धैर्य रखें

प्रतिकूलताओं में धैर्य रखें

अनेक लोग एक छोटी-सी अप्रिय घटना  या नगण्य सी हानि से व्यग्र हो उठते हैं और यहाँ तक व्याकुल हो उठते हैं  कि जीवन का अंत ही कर देने की सोचने लगते हैं और यदि ऐसा नहीं भी करते हैं तो भविष्य की सारी आकांक्षाओं को छोड़कर  एक हारे हुए सिपाही की भाँति  हथियार डाल कर अपने से ही विरक्त होकर निकम्मी जिंदगी अपना लेते हैं । यह यह भी एक आत्महत्या का ही रूप है ।

इस प्रकार की आत्म हिंसा के मूल में अप्रिय घटना, असफलता अथवा हानि का हाथ नहीं होता,  बल्कि इसका कारण होता है मनुष्य की अपनी मानसिक दुर्बलता । हानियाँ अथवा अप्रियताएँ तो आ कर चली जाती है । वे जीवन में ठहरती तो नहीं, किंतु दुर्बल मन व्यक्ति उनकी छाया पकड़ कर बैठ जाता है और अपनी चिंता का सहारा उन्हें वर्धमान किए रहता है । घटनाओं की कटुताओं एवं अप्रियताओं की कल्पना भर करके और हठात् उनकी  अनुभूति जगा कर अपने को सताया करता है । धीरे-धीरे वह अपनी इस काल्पनिक कटुता का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि वह उसके स्वभाव की एक अंग  बन जाती है और मनुष्य एक स्थायी निराशा का शिकार बन कर रह जाता है । इन सब अस्वाभाविक दुर्दशा का कारण केवल उनकी "मानसिक दुर्बलता" ही  होती है ।

जहाँ अनेक व्यक्ति अप्रियता अथवा प्रतिकूलताओं से इस प्रकार की शोचनीय अवस्था में पहुँचकर  जिंदगी चौपट कर लेते हैं, वहाँ अनेक लोग अप्रियताओं एवं प्रतिकूलताओं से अधिक सक्रिय, साहसी एवं उद्योगी हो उठते हैं । वे पीछे हटने के बजाए आगे बढ़ते हैं । हथियार डालने के स्थान पर उन्हें आगामी संघर्ष के लिए संजोते संभालते हैं । वे संसार को आँख खोल कर देखते हैं और अपने से कहते हैं "इस दुनिया में ऐसा कौन है जो जीवन में सदा सफल ही होता रहा है, जिसके सम्मुख कभी अप्रियताएँ अथवा प्रतिकूलताएँ आई ही न हों ।  किंतु कितने लोग निराश, हताश,  निरुत्साह अथवा हेय-हिम्मत होकर बैठे रहते हैं । यदि ऐसा रहा होता तो इस संसार में न तो कोई उद्योग करता दिखाई देता और न हँसता बोलता  । सारा जन समुदाय निराशा के अंधकार से भरा केवल उदास और आँसू बहाता ही दिखाई देता है ।" वे खोज- खोजकर कर्मवीरों के उदाहरण अपने सामने रखते हैं,  ऐसे लोगों पर अपनी दृष्टि डालते हैं, जो जीवन में अनेक बार गिरकर उठे होते हैं । वे  भविष्य की असफलताओं की कटु कल्पनाएँ नही, वरन् भविष्य की सफलताओं की  आराधना किया करते हैं । उनके मनोहर दृष्टिकोण का कारण उनका "मानसिक बल" तथा "आत्मविश्वास" ही होता है ।

"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-१२
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

निराश क्यों हुआ जाए ?

निराश क्यों हुआ जाए ?

प्रतिदिन रात आती है ।चारों ओर अंधकार छा जाता है । मानव जीवन के सारे काम बंद हो जाते हैं ।  रात और रात का अंधकार किसी को अच्छा नहीं लगता ।तब भी सभी लोग उसे सहन करते हैं  काटते हैं । रात आने पर न तो कोई घबराता है, न हाय-हाय करता है और  न रोता-चिल्लाता है । क्यों ? इसलिए कि काली रात के पीछे एक प्रकाशमान दिन तैयार रहता है । सभी को विश्वास रहता है कि रात बीतेगी और शीघ्र  ही प्रभात आएगा । चिंता और  दु:ख की बात तो तब हो, जब रात का अंत संभव न हो और प्रभात की संभावना न रहे ।

"निराशा" भी एक प्रकार का काला अंधकार होता है किंतु रात की तरह   इसका भी अस्तित्व भी  स्थायी नहीं होता । शीघ्र ही इसका समाप्त हो जाना निश्चित होता है । इसका अस्तित्व कुछ समय के लिए घिर आए काले  अंधेरे बादलों की तरह ही होता है, जो  शीघ्र ही अपने आप कट जाते हैं । निराशा मिटती है, उसके साथ ही आह्ललादकारी आशा अपना नव प्रकाश लेकर आती है यह प्रकृति  का एक "अटल" नियम  है ।

तब न जाने लोग निराशा का वातावरण आने पर बेतरह घबरा क्यों उठते हैं ? शीघ्र ही साहस हार जाते हैं और जीवन से ऊबने लगते हैं । एक ही रट लगाए रहते हैं-  "मैं जीवन से ऊब गया हूँ, मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता । संसार मेरे लिए भय और  अंधकार की जगह बन गया है । मेरे चारों ओर मुसीबत ही मुसीबत घिरी खड़ी है । मैं बड़ा दु:खी हूँ,  मेरा जैसा दु:ख संसार में किसी पर न आया होगा ।

निराशा से  इस प्रकार बेतरह  घबरा उठने वाले लोगों को देख कर मानना पड़ता है कि किसी विद्वान की कही हुई यह बात ठीक है  कि "निराशा" को अपने ऊपर छाने देना एक प्रकार की कायरता है  । जो आदमी  कायर और कमजोर होता है, वह जरा सी प्रतिकूलता आने पर घबराकर निराश हो जाता है । उसमें कठिनाइयों का सामना करने का साहस नहीं होता और शीघ्र ही निराशा का शिकार बनकर संसार और जीवन को निस्सार और बेकार मान बैठता है ।

"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-८
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

स्वस्थ रहने के लिऐ "मस्तिष्क" को नियंत्रित कीजिए



स्वस्थ रहने के लिऐ "मस्तिष्क" को नियंत्रित कीजिए

शरीर पर "मन" का नियंत्रण है- इस तथ्य  को  हम प्रतिक्षण देखते हैं । मस्तिष्क की इच्छा और प्रेरणा के अनुरूप प्रत्येक अंग कार्य करता है । प्रत्यक्ष रुप से दिखाई देने वाले क्रिया-कलाप हमारी मानसिक प्रेरणाओं से ही प्रेरित होते हैं । जो कार्य स्वसंचालित दिखाई पड़ते हैं,  वे भी वस्तुतः हमारे अचेतन मन की क्षमता एवं प्रवीणता से  संचालित होते हैं । श्वांस-प्रश्वांस, रक्ताभिषरण, आकुंचन-प्रकुंचन, निद्रा-जागृति, पाचन, मल विसर्जन जैसी स्वयंमेव चलती प्रतीत होने वाली क्रियाएँ भी अचेतन मन के द्वारा गतिशील रहती है । शरीर को ऐसा घोड़ा मानना चाहिए, जिसकी प्रत्यक्ष और परोक्ष नियंत्रण सत्ता पूरी तरह "मस्तिष्क" के हाथ में है ।

"मस्तिष्क" को स्वस्थ, संतुलित और  हल्का-फुल्का रखे बिना कोई व्यक्ति अपने शरीर को निरोग एवं परिपुष्ट रख सकने में सफल नहीं हो सकता । मन पर उद्वेगों का तनाव छाया रहेगा तो शरीर का आहार-विहार ठीक रहने पर भी रोगों के आक्रमण होने लगेंगे और बढ़ती हुई दुर्बलता अकाल मृत्यु की और तेज से घसीटती ले चलेगी । इसके विपरीत हँसते-हँसाते शांत संतुलित मन:स्थिति में जीवनयापन  हो रहा हो तो  शरीरगत असुविधाओं के रहते हुए भी स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहेगा ।

शरीर की देखभाल रखने और उसे स्वस्थ सुंदर रखने के लिए खुराक, साज-सज्जा, सुविधा आदि का जितना ध्यान रखा जाता है, उतना ही ध्यान मस्तिष्क को उद्वेग रहित, संतुष्ट एवं प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाए तो स्वास्थ्य रक्षा की तीन चौथाई समस्या हल हो सकती है ।

"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-३
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

मन की स्थिरता एवं एकाग्रता अर्थात "तन्मयता"

मन की स्थिरता एवं एकाग्रता अर्थात "तन्मयता"

"मन" की स्थिरता एवं एकाग्रता का सार तत्व "तन्मयता" शब्द में आ जाता है । गायत्री उपासना में यह प्रयोजन "तन्मयता" से पूरा होता है । "तन्मयता" का अर्थ है  "इष्ट" के साथ भाव संवेदनाओं को केंद्रीभूत कर देना । यह स्थिति तभी आ सकती है जब इष्ट के प्रति "असीम श्रद्धा" हो । "श्रद्धा" तब उत्पन्न होती है,  जब किसी की "गरिमा" पर परिपूर्ण विश्वास हो । साधक को अपनी मनोभूमि ऐसी बनानी चाहिए जिसमें गायत्री महाशक्ति की चरम उत्कृष्टता पर, असीम शक्ति सामर्थ्य पर, संपर्क में आने वाले के उत्कर्ष होने, पर गहरा विश्वास जमता चला जाए । यह कार्य शास्त्र वचनों का, अनुभवियों द्वारा बताए गए सत्परिणामों का, उपासना विज्ञान की प्रामाणिकता का, अधिकाधिक अध्ययन अवगाहन करने पर संपन्न होता है । आशंकाग्रस्त, अविश्वासी जन, उपेक्षा भाव से आधे अधूरे मन से उपासना में लगें,  तो स्वभावत: वहाँ उसकी रूचि नहीं होगी और मन जहाँ-तहाँ उड़ता फिरगा । मन लगने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाए । व्यवसाय-उपार्जन में, इंद्रिय भोगों में, विनोद मनोरंजनों में, सुखद कल्पनाओं में, प्रिय जनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज  ही लग जाता है । इसका कारण यह है कि इन प्रसंगों के द्वारा मिलने वाले सुख, लाभ एवं अनुभव के संबंध में पहले से ही विश्वास जमा होता है । 

प्रश्न यह नहीं है कि वे आकर्षण, दूरदर्शिता की दृष्टि से लाभदायक हैं या नहीं । तथ्य इतना ही है कि उन विषयों के संबंध में अनुभव-अभ्यास के आधार पर मन में आकर्षण उत्पन्न हो गया है । उस आकर्षण के फलस्वरूप ही मन उनमें रमता है और भाग-भाग कर जहाँ-तहाँ घूम फिर कर वही जा पहुँचता है । हटाने से हटता नहीं, भगाने से भागता नहीं । मानसिक संरचना के इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें "उपासना" के समय मन को "इष्ट" पर केंद्रित रखने की आवश्यकता पूरी करने के लिए पहले से ही मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना चाहिए । गायत्री  महाशक्ति के संदर्भ में जितना अधिक ज्ञान-विज्ञान संग्रह किया जा सके मनोयोग पूर्वक करना चाहिए । विज्ञ व्यक्तियों के साथ उसकी चर्चा करनी चाहिए । इस संदर्भ में होने वाले सत्संग में नियमित रूप से जाना चाहिए । जिसने लाभ उठाये हों, उनके अनुभव सुनने चाहिए । यह कार्य यों तद्विषयक स्वाध्याय और मनन चिंतन के एकाकी प्रश्न से भी संभव हो सकता है, पर अधिक सरल और व्यावहारिक यह है कि गायत्री चर्चा के संदर्भ में चलने वाले सत्संग में उत्साह पूर्वक नियमित रूप से सम्मिलित होते रह जाए ।
आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-४१
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

उच्च स्तरीय अवस्था है चित्त की एकाग्रता

उच्च स्तरीय अवस्था है चित्त की एकाग्रता   

"उपासना" के लिए जिस "एकाग्रता" का प्रतिपादन है, उसका लक्ष्य है भौतिक जगत् की कल्पनाओं से मन को विरत करना और उसे अंतर्जगत् की क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित कर देना । "उपासना" के समय यदि मन सांसारिक प्रयोजनों में न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि "एकाग्रता का उद्देश्य" ठीक तरह पूरा हो रहा है । विज्ञान के शोध कार्यों में, साहित्य के सृजन प्रयोजनों में, वैज्ञानिक या लेखक का चिंतन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है । इतने भर में "एकाग्रता" का प्रयोजन पूरा हो जाता है । यद्यपि इस प्रकार के "बौद्धिक पुरुषार्थ" में "मन" और "बुद्धि" को असाधारण रूप से गतिशील रहना पड़ता है और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे "चंचलता" नहीं कहा जाता है । अपनी निर्धारित परिधि में रहकर कितना ही द्रुतगामी चिंतन क्यों न किया जाए ? कितनी ही कल्पनाएँ, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर रही हों, वे "एकाग्रता" की स्थिति में तनिक भी विक्षेप उत्पन्न नहीं करेंगी । गड़बड़ तो अप्रासंगिकता में उत्पन्न होती है । बेतुका--बेसिलसिले का अप्रासंगिक "अनावश्यक चिंतन" ही विक्षेप करता है । एक बेसुरा वादन पूरे आर्केस्ट्रा के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है । ठीक इसी प्रकार चिंतन में "अप्रासंगिक विक्षेपों"  का ही निषेध है । निर्धारित परिधि में कितनी ही, कितने ही प्रकार की कल्पनाएँ, विवेचना करते रहने की पूरी-पूरी छूट है ।

आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-३८
पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

एकाग्रताउपासना के लिए अत्यंत उपयोगी

एकाग्रताउपासना के लिए अत्यंत उपयोगी

"उपासना" में "एकाग्रता" पर बहुत जोर दिया गया है । ध्यान-धारणा का अभ्यास इसीलिए किया जाता है कि मन की अनियंत्रित भगदड़ करने की आदत पर नियंत्रण स्थापित किया जाए और उसे तथ्य विशेष पर केंद्रित होने के लिए प्रशिक्षित किया जाए ।

"एकाग्रता" एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है । मन  की अनियंत्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केंद्रित किया गया होता तो गहराई में उतरने और महत्वपूर्ण उपलब्धता प्राप्त करने का अवसर मिलता । *यह "चित्त" की चंचलता ही है, जो मन:संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती  और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है ।

संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं, उन सबको विचारों पर नियंत्रण करने, उन्हें अनावश्यक चिंतन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त रही है । 

इसके बिना "चंचलता" की वानरवृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है । शिल्प, कला, साहित्य , शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है । "चंचलता" को तो असफलता की सगी बहन माना जाता है ।  "बाल चपलता" का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है । वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे, विचारों की दिशा धारा बनाने और चिंतन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है । ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं

आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-३६
पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

हनुमान जन्मोत्सव की अनंत शुभकामनाएं और बधाईयां

हनुमान जन्मोत्सव की अनंत शुभकामनाएं और बधाईयां

तुलसी दास जी ने हनुमान जी को विज्ञानी बताया है। उन्हें एक विज्ञानी के रूप में ही देखा और समझा जाना चाहिए। हनुमान जी अपनी हर एक सांस में प्रभु श्रीराम का नाम लेते हैं। यह कोई आसान बात नहीं है। इसके लिए योग की गहरी जानकारी होनी चाहिए। हम कह सकते हैं कि हनुमान जी को योग विज्ञान की अच्छी जानकारी थी। भजन एक विज्ञान है। हनुमान जी को भजन विज्ञान की भी जानकारी थी। हनुमान जी निरंतर अपने प्रभु श्रीराम का भजन करते रहते थे। हनुमान जी को व्यास (विस्तार) विज्ञान का ज्ञान था। हनुमान जी जरूरत पड़ने पर अपने रूप को बड़ा कर लेते थे।

लंका दहन के समय देखा गया कि हनुमान जी की पूंछ काफी विशाल हो गई थी। इसके अलावा उन्होंने लंका में माता सीता को अपने स्वर्ण रूप का दर्शन कराया था। हनुमान जी के पास गजब का विश्वास था। उनका यह विश्वास प्रभु श्रीराम में था। राम जी में विश्वास रखते हुए हनुमान जी ने कई बड़े-बड़े कार्य कर डाले। चाहे विशाल समुद्र को पार करना हो, सीता जी का पता लगाना हो या फिर हिमालय पर्वत से संजीवनी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण की रक्षा करनी हो, ये सब हनुमान जी के विश्वास विज्ञान की वजह से ही हो सका। हनुमान जी को समास (सूक्ष्म) विज्ञान का भी ज्ञान था।

रामायण में देखा गया कि लंका जाते समय समुद्र पार करने के लिए हनुमान जी ने अति सूक्ष्म रूप धारण कर लिया था। यह सूक्ष्म विज्ञान की जानकारी के बिना नहीं हो सकता। हनुमान जी को 'अतुलित बलधामा' कहा जाता है। जिसमें शील हो वही चरित्रवान है। हनुमानजी का शील ही चरित्र है और चरित्रवान ही वास्तव में बलवान होता है। चरित्रवान में बहुत बल होता है। रावण ने युद्ध में समस्त राक्षसों से कहा कि सबकी निंदा कर लेना, लेकिन हनुमान जी की निंदा मत करना। क्योंकि हनुमान जी शिव का रूप हैं और मेरे गुरु शिव हैं। हनुमान जी जैसी पवित्रता भी किसी में नहीं मिलेगी। गोस्वामी तुलसीदास कहते है कि हनुमान में अर्थ पावित्र्य है। हनुमान जी काम पावित्र्य है। हनुमान जी मोक्ष पावित्र्य हैं। हनुमान जी विनम्र हैं। विनम्रता के आचार्य हैं।
हनुमान जी यज्ञ पुत्र हैं, यज्ञप्रसाद हैं। हनुमान नीति निपुण हैं। हनुमान जी नीति निर्धारक हैं। हनुमान जी का जन्म भी दिव्य है और कर्म भी। जब सुग्रीव उन्हें राम की टोह लेने के लिए उनके पास भेजते हैं तो हनुमान जी ब्राह्मण का वेश धर कर जाते हैं और सबसे पहले राम को प्रणाम करते हैं। यहां मानो हनुमान जी ने संदेश दिया है कि सच्चा ब्राह्मण वही है, जो पूरी दुनिया को प्रणाम करे। श्रेष्ठ मनुष्य दूसरों का आदर करते हैं। जिस तरह अग्नि धुएं को ऊपर रखती है और पर्वत तिनके को ऊपर रखता है, वैसे ही जो श्रेष्ठ होता है, सक्षम होता है, वह सदैव दूसरों को सम्मान देकर अपने से ऊपर ही रखता है।

आत्मा के कल्याण को समझिये

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

आत्मा के कल्याण को समझिये

शरीर को सुख साधन मिलते रहें,  उसे पद और यश का लाभ मिला सो सही, पर शरीर ही तो सब कुछ नहीं है । "आत्मा" तो उससे भिन्न है । आत्मा की उपेक्षित स्थिति में पड़े रहने की दयनीय स्थिति ही बनी रहे, तो यह तो ऐसा ही हुआ जैसा मालिक को भूखा रखकर मोटर की साज-सज्जा में ही सारा समय, धन और मनोयोग लगा दिया जाए । इस भूल का दुष्परिणाम आज तो पता नहीं  चलता,  पर तब समझ में आता है जब जीवन संपदा छिन जाती है ।
भगवान के दरबार में उपस्थित होकर यह जवाब देना पड़ता है कि इस सुर दुर्लभ उपहार को जिस सद्प्रयोजन  के लिए दिया गया था वह पूरा किया गया या नहीं । यदि नहीं तो इसका दंड एक ही हो सकता है कि फिर भविष्य में वह उत्तरदायित्व पूर्ण अवसर न दिया जाए और पहले की ही तरह तुच्छ योनियों के लंबे चक्र में भटकने दिया जाए । मनुष्य में से अनेकों को इसी लंबी दुर्गति में फँसना पड़ता है और अपनी भूल पर पश्चाताप करना पड़ता है कि, जब अवसर था तब हम गहरी नींद में पड़े रहे-- इंद्रियों की वासना और मन की तृष्णा के नशे में इस कदर खोये रहे कि लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझ  ही नहीं पड़ा . यदि समय रहते आँख खुली होती तो कृमि-कीटकों  का सा पेट और प्रजनन के लिए समर्पित जीवन जीने की भूल न की गई होती । शरीर के अतिरिक्त आत्मा भी जीवन का एक पक्ष है और उसकी भी कुछ आवश्यकताएँ हैं, जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए जो समय निकाला जाता है प्रयत्न किया जाता है,  'उसी को "उपासना प्रक्रिया" कहते हैं ।' आत्मा का स्वार्थ ही  वास्तविक स्वार्थ है । उसी को "परमार्थ" कहते हैं ।  परमार्थ का चिंतन -- उसके लिए बुद्धि का उद्बोधन, प्रशिक्षण जिन क्षणों में किया जाता है, वस्तुतः वही सौभाग्य भरे और सराहनीय क्षण हैं । यदि इस दृष्टि का उदय हो सके तो "उपासना" को नित्य कर्मो में सबसे अधिक आवश्यक अनिवार्य स्तर का माना जाएगा । वास्तविक "स्वार्थ" साधना के क्षण वही तो होते हैं ।

आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-२४
पन्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

हम बुद्धिमान सिद्ध भी तो हों

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

हम बुद्धिमान सिद्ध भी तो हों

"बुद्धिमत्ता" इस बात में थी कि "आत्मा" और "शरीर" दोनों की आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता ।  श्रम और बुद्धि की जो सामर्थ्य प्राप्त है, उनका उपयोग दोनों क्षेत्रों के लिए इस प्रकार किया जाता कि "शरीर" की सुरक्षा बनी रहती और "आत्मा" अपने महान लक्ष्य को प्राप्त कर सकने में सफल हो जाती, किंतु होता विचित्र है । जो बुद्धि आए दिन अनेक समस्याओं के सुलझाने में, संपदा और उपलब्धियों के उपार्जन में, पग-पग पर चमत्कार दिखाती है, वह मौलिक नीति निर्धारण में भारी चूक करती है ।
सारे का सारा कौशल शारीरिक सुख-सुविधाओं के संचय-संवर्धन में लग जाता है । यहाँ तक कि अपने आप को पूरी तरह शरीर ही मान लिया जाता है, "आत्मा" के अस्तित्व एवं लक्ष्य का ध्यान ही नहीं रहता है, आत्म कल्याण के लिए कुछ सोचते करते बन ही नहीं पड़ता । बुद्धि का यह एक पक्षीय असंतुलन ही जीवात्मा का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है । उसी से छुटकारा पाने के लिए "ब्रह्म-ज्ञान", "आत्म-ज्ञान", "तत्व-ज्ञान" के विशालकाय कलेवर की संरचना की गई है ।  "बुद्धि" को आत्मा का स्वरुप और लक्ष्य  समझने का अवसर देना ही "उपासना" का मूलभूत उद्देश्य है ।
 चौबीसों घंटे मात्र शरीर के लिए ही शत-प्रतिशत दौड़ धूप करने वाली भौतिकता में पूरी तरह रंगी हुई और लगी हुई बुद्धि को कुछ समय उस भगदड़ से विश्राम देकर आत्मा की स्थिति और आवश्यकता समझने के लिए सहमत किया जाता है । उस अति महत्वपूर्ण  पक्ष की उपेक्षा न करने, उस संदर्भ में भी कुछ करने के लिए बुद्धि पर दबाव दिया जाना उपासना का तात्विक उद्देश्य है । "मन" को तदनुसार कल्पनाएँ और बुद्धि तद्विषयक धारणाएँ करने के लिए उपासना पद्धति के आधार पर प्रशिक्षित किया जाता है । वह बहुत बड़ा  काम है । सांसारिक जीवन के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण कामों में से  यह एक है । मोटी समझ से तो उसकी तात्कालिक उपयोगिता प्रतीत नहीं होती और  कोई आकर्षण न होने से मन भी नहीं लगता, पर विवेक दृष्टि से देखने पर जब उस कार्य की महत्ता समझ में आ जाती है, तब प्रतीत होता है कि यह इतना लाभदायक, उत्पादक, आकर्षक और महत्वपूर्ण कार्य है, जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी कार्य से नहीं हो सकती ।
आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव पृष्ठ-२३
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

मनुष्य जन्म को सार्थक करें

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मनुष्य जन्म को सार्थक करें

मनुष्य जीवन के दो लक्ष्य हैं  पहला संग्रहित कुसंस्कारों और कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाना और परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाकर विश्व उद्यान का परिपूर्ण आनंद उपलब्ध करना । परिष्कृत जीवन के साथ जुड़ी हुई आनंद भरी उपलब्धियाँ "स्वर्ग" कहलाती हैं और दुर्बुद्धि से, दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने को "मुक्ति" कहते हैं । जीवन का एक लक्ष्य यह है ।

दूसरा है भगवान के विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में संलग्न होकर अपनी गरिमा को विकसित करना । मनुष्य को ईश्वर का राजकुमार, उत्तराधिकारी एवं पार्षद कहा गया है और उसके कंधों पर यह  उत्तरदायित्व डाला गया है कि स्रष्टा के विश्व उद्यान का सौंदर्य बढ़ाने में हाथ बटाएँ और सच्चे मित्र, भक्त की भूमिका संपन्न करें ।
दोनों प्रयोजनों को जो जितनी मात्रा में पूरा करता है, वह उतना ही बड़ा "ईश्वर भक्त" कहलाता है । इस मार्ग पर चलने वाले महामानव, संत, ब्राह्मण, ऋषि, देवात्मा, अवतारी आदि नामों से पुकारे जाते हैं । उन्हें असीम "आत्म संतोष" प्राप्त होता है और "लोक सम्मान" एवं "सहयोग" की वर्षा होने से उन्हें अपने उच्च स्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति में असाधारण सफलता भी मिलती है । उनके क्रिया-कृत्य ऐतिहासिक होते हैं और उनके प्रभाव से असंख्यों को ऊँचा उठने का, आगे बढ़ने का असाधारण सहयोग मिलता है । धन-संपत्ति कमाना जब लक्ष्य ही नहीं, वैयक्तिक तृष्णाओं से जब उपराम ही पा लिया गया तो फिर उनका संचय न होना स्वाभाविक ही है ।  वैभव की दृष्टि से संपन्न होने की जब वे इच्छा ही नहीं करते तो फिर धनवान वे बनेंगे भी कैसे ?  इतने पर भी उनकी आंतरिक संपन्नता इतनी बढ़ी-चढ़ी होती है कि अपनी नाव पार लगाने के साथ असंख्यों को उस पर बिठाकर पार लगा सकें । ईश्वर का असीम "अनुग्रह" और "अनुदान" ऐसे ही लोगों के लिए सुरक्षित रहा है ।  "लोक" और "परलोक" का बनाना इसी को कहते हैं । मनुष्य जीवन इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए मिला है, जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं उन्हीं का नर जन्म धारण करना धन्य एवं सार्थक बनता है, वे ही इस सुर दुर्लभ उपलब्धि का रसास्वादन करते हुए कृतकृत्य होते हैं । जो इस मार्ग पर जितना बढ़ सका, समझना चाहिए कि उसने उतनी ही मात्रा में लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता पा ली ।

आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-२२
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

उपासना का सही स्वरूपसमझने की आवश्यकता

उपासना का सही स्वरूपसमझने की आवश्यकता

उपासना" की प्रक्रिया को अंतःकरण की वरिष्ठ चिकित्सा समझा जाना चाहिए । कुसंस्कारों की, कषाय कल्मषों  की  महाव्याधि से छुटकारा पाने के लिए यही "रामबाण औषधि" है । उच्चस्तरीय "श्रद्धा" का जागरण और वरिष्ठ "निष्ठा" का प्रतिपादन "भगवद्भक्ति" की  शिराओं में दवा का प्रवेश कराने के लिए इंजेक्शन की पोली सूई की जो भूमिका है, वही कार्य उत्कृष्टता को "अंतःकरण" की गहराई तक पहुँचाने में "उपासना" करती है ।
पिछले दिनों "उपासना" के नाम पर भोंडा जाल-जंजाल ही जनसाधारण के गले में बाँध दिया गया है ।  देवताओं को फुसलाकर उचित-अनुचित मनोकामनाएँ पूरी कर लेने की आशा से ही अच्छी बुद्धि के लोग पूजा पाठ करते पाए जाते हैं । यदि उन्हें "उपासना" का तत्वज्ञान और प्रतिफल ठीक तरह समझने का अवसर मिला होता और "आत्म परिष्कार" के उद्देश्य से जनसाधारण को इस पुण्य प्रयोजन में लगाया गया होता,  तो स्थिति दूसरी ही होती ।उपासना के माध्यम से आस्थाओं के उत्कर्ष का उद्देश्य ध्यान में रखा गया होता तो, व्यक्तित्व निखरते, परिष्कृत होते और प्रखर बनते । तब "उपासना" करने वाला "भिक्षुक" की नहीं वरन् "दानी" की स्थिति में होता ।       
स्वयं पार होता और असंख्यों को अपनी नाव में बिठाकर पार करता ।
 देवताओं के सामने उसे नाक रगड़ने की आवश्यकता न पड़ती वरन् स्वयं अपने आप में "देवत्व" का उदय देखता, संपर्क क्षेत्र में "स्वर्गीय" वातावरण उत्पन्न करता । प्राचीन काल में आत्म विज्ञान का यही स्वरूप था । ऐसी ही "प्रखर उपासना" का अभ्यास किया जाता था । आज फिर उसी तथ्य पू्र्ण उपासना पद्धति से जन-जन को अवगत और अभ्यस्त कराने की आवश्यकता है ।

आत्म-शक्ति से युग शक्ति का उद्भव पृष्ठ-११
     पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

श्रद्धा अत्यंत समाजोपयोगी तत्व

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

श्रद्धा अत्यंत समाजोपयोगी तत्व

संपूर्ण जीवन प्रवाह एवं उसकी उपलब्धियाँ वस्तुतः श्रद्धा" की ही परिणति है ।  माँ अपना अभिन्न अंग मानकर नौ माह तक अपने गर्भ में बच्चे का सेचन करती है । अपने रक्त मांस को काटकर शिशु को पोषण प्रदान करती है । श्रद्धाका यह उत्कृष्ट स्वरूप है जिसका बीजारोपण माँ बच्चे में संस्कार के रूप में करती है । नि:स्वार्थ भाव से उसको संरक्षण देती है । अनावश्यक भार, कष्टों का जंजाल समझने का कुतर्क उठे तो नवशिशु  का प्रादु्र्भाव ही संभव न हो सकेगा ।
 यह श्रद्धाही है जिसके कारण बच्चा माँ के सीने से चिपकने, स्नेह-दुलार पाने के लिए लालायित रहता, रोता-कलपता है । मूक भाषा वाणी से रहित नव शिशु की श्रद्धाएकमात्र माँ के ऊपर ही होती है । माता-पिता भी निश्चल हृदय से बच्चे के विकास के लिए हर संभव प्रयास करते हैं । खाने-पीने, स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर शिक्षा-दीक्षा के झंझट भरे सरंजाम जुटाते हैं । समग्र विकास ही उनका एकमात्र लक्ष्य होता है । तर्कतो हर बात को उपयोगिता की कसौटी पर कसता है ।इस आधार पर कसने पर माता-पिता को हर दृष्टि से घाटा ही घाटा दिखायी  पड़ेगा । बात "तर्क" की मान ली जाए तो बच्चे का अस्तित्व ही शंका में पड़ जाएगा । दृष्टि मात्र उपयोगितावादी हो जाए तथा यह परंपरा प्रत्येक क्षेत्र में चल पड़े, तो परिवार एवं समाज विश्रृंखलित हो जाएगा । सभ्यता को अधिक दिनों तक जीवित नहीं रखा जा सकेगा ।
 श्रद्धा ही पारिवारिक जीवन को स्नेह सूत्र में बांधे रहती है ।  सहयोग करने, अन्य सदस्यों के लिए अपने स्वार्थ का उत्सर्ग करने की प्रेरणा देती है । पारिवारिक विघटन में इसका अभाव ही कारण बनता है । पति-पत्नी के बीच मनमुटाव, सदस्यों के बीच टकरा हट का कारण अश्रद्धा है । तर्कएवं "उपयोगिता" की कसौटी पर कसने पर तो वृद्ध माता-पिता का महत्व भी समझ में नहीं आता ।वे भार के रूप में ही दिखाई पड़ते हैं । किंतु श्रद्धा दृष्टि जानती  है कि  उनका कितना ऋण चढ़ा है  उनके स्नेहाशीर्वाद को पाने की कामना आजीवन बनी रहती है । यह भाव दृष्टि तो श्रद्धा की ही उपलब्धि है, जो सदा एक युवक को माता पिता के समक्ष नतमस्तक किये रहती है ।
साधना से सिद्धि- पृष्ठ-६२
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

साधना की सफलता के दस लक्षण

नमस्कार मित्रो, ऋषि चिन्तन चैनल में आपका स्वागत है, आज का विषय है ।

साधना की सफलता के दस लक्षण

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता पर भीतर ही भीतर भारी हेर−फेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोश और मनोमय कोषों में जो परिवर्तन होता है उसकी छाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टि गोचर न हो ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढांचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर फेर के चिन्ह शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।
 यह दस_लक्षण नीचे दिए जाते है।
1. शरीर में हलकापन और मन में उत्साह होता है।
2. शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगंध आने लगती है।
3. त्वचा पर चिकनाई और कोमलता का अंश बढ़ जाता है।
4. तामसिक आहार विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विक दिशा में मन लगता है ।
5. स्वार्थ का कम और परमार्थ का अधिक ध्यान रहता है।
6. नेत्रों में तेज झलकने लगता है।
7. किसी व्यक्ति या कार्य के विषय में वह जरा भी विचार करता है तो उसके संबंध में बहुत सी ऐसी बातें स्वयमेव प्रतिमथित होती है। जो परीक्षा करने पर ठीक निकलती है।
8. दूसरों के मन के भाव जान लेने में देर नहीं लगती।
9. भविष्य में घटित होने वाली बातों का पूर्णाभ्यास मिलने लगता है।
10.शाप या आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ भला या बुरा कर सकता है।
यह दस लक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि साधक का मार्ग पक गया और सिद्धि का प्रसव हो चुका। इस शक्ति सन्तति को जो साधक सावधानी के साथ पालते पोसते हैं उसे पुष्ट करते है। वे भविष्य में आज्ञाकारी सन्तान वाले बुजुर्ग की तरह आनन्द परिणामों का उपभोग करते हैं किन्तु जो फूहड़ जन्मते ही सिद्धि का दुरुपयोग करते हैं उनकी स्वल्प शक्ति का विचार न करते हुए उस पर अधिक भार डालते हैं उनकी गोदी खाली हो जाती है और मृतवत्सा माता की तरह उन्हें पश्चाताप करना पड़ता है।

 पन्डित श्री राम शर्मा आचार्य

"श्रद्धा" और "विश्वास" उत्कृष्ट जीवन का आधार

"श्रद्धा" और "विश्वास" उत्कृष्ट जीवन का आधार

"श्रद्धा" और "विश्वास" के बिना भौतिक जीवन में भी गति नहीं, फिर आध्यात्मिक क्षेत्र का तो उसे प्राण ही कहा गया है । आदर्शवादिता में प्रत्यक्षत: हानि ही रहती है, पर "उच्चस्तरीय मान्यताओं" में "श्रद्धा" रखने के कारण ही मनुष्य त्याग-बलिदान का कष्ट सहन करने के लिए खुशी-खुशी तैयार होता है . ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व तक प्रयोगशालाओं की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता । वह निश्चित रूप से "श्रद्धा" पर ही अवलंबित है । मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का, आदतों का गहरा पुट रहता है, वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार की आदतें और मान्यताएँ अत्यंत गहराई तक घुसी रहती हैं और वे उन्हें छोड़ने को सहज ही तैयार नहीं होते । यह संस्कार और कुछ नहीं चिरकाल तक सोचे गये, माने गये और व्यवहार में लाए गये अभ्यासों का ही परिपाक है  । तथ्यों की कसौटी पर इन संस्कारों में से अधिकांश "बेतुके" और "अंधविश्वास" स्तर के होते हैं, पर मनुष्य इन्हें इतनी मजबूती से पकड़े होता है कि उसके लिए वे ही "सत्य" बन जाते हैं और सत्य और तथ्य कह कर वह उन पूर्वाग्रहों के प्रति अपनी कट्टरता का परिचय देता है । उसके लिए लड़ने-मरने तक को तैयार हो जाता है । यह मान्यता परक कट्टरता और कुछ नहीं मात्र "श्रद्धा" द्वारा रची गयी खिलवाड़ मात्र है ।

"तर्क" की शक्ति का जन्म भी  "श्रद्धा" के गर्भ से ही होता है । यों तो तर्क विचारणा को जन्म देता है और श्रद्धा विश्वास को, पर विचारणा भी विचार के लिए आधार ढूँढती है । आधार तभी बन सकता है जब "विश्वास" हो । अन्यथा तर्क बुद्धि तो किसी भी केंद्र पर चिंतन को केंद्रीभूत नहीं कर सकती । यह तो तभी बन पाता है जब विश्वास के सहारे विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि *"श्रद्धा" के अभाव में "विचारणा", "तर्क" का प्रादुर्भाव संभव नहीं । किसी विषय पर आस्था ही तर्कों का सृजन करती, उस पर सोचने, सत्य को खोज निकालने को प्रेरित करती है । "श्रद्धा" मानवीय व्यक्तित्व के मूल में घुली-मिली है, जिसके बिना एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता । आगे बढ़ने, प्रगति करने की बात तो दूर रही । यह बात अलग है कि हम उसका अनुभव न कर सकें ।

साधना से सिद्धि- पृष्ठ-६०
 पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

યુગક્રાંતિના ઘડવૈયા પં. શ્રીરામ શર્મા આચાર્ય

યુગક્રાંતિના ઘડવૈયા પં. શ્રીરામ શર્મા આચાર્યની કલમે લખાયેલ ક્રાંતિકારી સાહિત્યમાં જીવનના દરેક વિષયને સ્પર્શ કરાયો છે અને ભાવ સંવેદનાને અનુપ્રાણિત કરવાવાળા મહામૂલા સાહિત્યનું સર્જન કરવામાં આવ્યું છે. તેઓ કહેતા “ન અમે અખબારનવીસ છીએ, ન બુક સેલર; ન સિઘ્ધપુરૂષ. અમે તો યુગદ્રષ્ટા છીએ. અમારાં વિચારક્રાંતિબીજ અમારી અંતરની આગ છે. એને વધુમાં વધુ લોકો સુધી ૫હોંચાડો તો તે પૂરા વિશ્વને હલાવી દેશે.”

દરેક આર્ટીકલ વાંચીને તેને યથાશક્તિ–મતિ જીવનમાં ઉતારવા પ્રયત્ન કરશો તથા તો ખરેખર જીવન ધન્ય બની જશે આ૫ના અમૂલ્ય પ્રતિભાવો આપતા રહેશો .

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